Saturday, 17 November 2012

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Friday, 9 March 2012

Prithivi Sukt ki Bhumika


                             माता भूमि और पृथिवी-पुत्र

        अथर्ववेद के कांड 12 का सूक्त 1 जिसके ऋषि अथर्वा हैं और देवता पृथिवी हैं, वेद के दर्शन, काव्य और विराट मानवीय आदर्श का एक सार्वकालिक और सार्वभौमिक ऐसा प्रतिनिधि आलेख है जो विश्व-सहित्य की अमूल्य धरोहर है । आश्चर्यजनक रीति से इसमें आज का विज्ञान और पर्यावण की चिन्तायुक्त वह सामाजिक सरोकार भी सम्मिलित है जिसका समाधान विश्व स्तर पर लगातार खोजे जाने की आज चेष्टा चल रही है । इसमें दिया गया संदेश उस प्रबुद्ध मानव के लिए है जिसकी तैयारी में विश्व-मानवता आज जैसे संकल्पित है और जिसे छोड़कर अन्य कोई विकल्प उसके सामने नहीं है ।

   वेद की सर्जनात्मक सत्ता इसलिए अपने आप को ऋषि कहती है क्योंकि उसकी कथावस्तु उसे कहने वाले से एकाकार होकर चलती है । यदि वेद का ऋषि पृथिवी के संबंध में कुछ कह रहा है तो वह पृथिवी विषयक अपने संबंध के सूत्र को भली प्रकार से संभाल चलता है । उसने इस 63 छंद की कविता के 12वें छन्द में ही घोषणा करदी है कि माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः। अर्थात् भूमि मेरी माता है और मैं हूं उस भूमि का पुत्र । इस प्रकार अथर्वा ऋषि द्वारा पृथिवी की देवता के रूप में आराधना का यह गान उसका आंतरिक ऐसा अभिज्ञान है जो उसे अपनी विषय वस्तु के आर पार झांकने की सामर्थ्य देता है। इसे ऐसे भी कहा जा सकता है कि पृथिवी जैसे स्वयं ही द्रष्टा से साक्षात्कार के आधार पर अपने आप को उद्घाटित कर रही है । विचार, सृजनात्मकता और संकल्प की सामर्थ्य जैसे यहां सत्ता को समेट कर चलने लगती है । अभिव्यक्ति की ऐसी परिपूर्णता विरल और अलौकिक ही कही जा सकती है । 

यहां आरम्भ में यह कहा जाना भी आवश्यक है कि वेद के द्रष्टा ऋषि की यह पृथिवी की अभ्यर्थना प्रकारान्तर से राष्ट्रभक्ति का ही व्यापकत्व है । यह भी विशेष रूप से यहां दृष्टव्य है कि यह राष्ट्र एक भौगोलिक सीमा में आबद्ध नहीं है । इसका विस्तार समस्त भूमण्डल और संपूर्ण मानवता तक पहुंचता है । यही कारण है कि जब आरम्भ में पृथिवी के धारक सात गुणों को रेखांकित किया जाता है तो इसका आशय राष्ट्र के लिए आवश्यक उन विशेषताओं का अर्थ रखता है जो उसकी संज्ञा और शक्ति को आधार देती हैं ।

इस सूक्त के पहले ही मन्त्र में कहा गया है-

सत्यं बृहदृतमुग्रं दीक्षा तपो ब्रह्म यज्ञः पृथिवीं धारयन्ति

अर्थात् बृहत् सत्य, ऋत्, उग्रता, दीक्षा, तप, ब्रह्म और यज्ञ तत्व ही पृथिवी (राष्ट्र) को धारण करते हैं । बृहत् सत्य अर्थात् हमारे देश की नीति का स्वीकृत मुण्डकोपनिषद् से लिया गया ध्रुव पद सत्यमेव जयते। ऋत अर्थात् परमेष्ठी का वह नियम जिसके अनुसार ग्रह मण्डल, तारे, वायु, जल और आकाश आदि संचालित हैं । उग्रता अर्थात् हमें कोई कमजोर मानकर डराने की चेष्टा न करे । दीक्षा अर्थात् अच्छे संस्कारों की शिक्षा । तप अर्थात् राष्ट्र के प्रति संपूर्ण त्याग की भावना और क्रिया । तथा यज्ञ से आशय मातृभूमि के प्रति समर्पण का सर्व कल्याणकारी भाव ।

इन विशेषताओं के उल्लेख से यह स्पष्ट हो जाता है कि हमारी शिक्षा, संस्कार और जीवन पर्यन्त का अभ्यास जब हमें अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर दूसरे अन्य, समाज, पृकृति और परमात्मा के प्रति अपने तदात्मीकरण की ओर ले चलता है तब ऐसे राष्ट्र और समाज की स्थापना की ओर हम प्रवृत्त होते हैं जो हमारे वैदिक दर्शन का आदर्श है ।

क्रमशः

                                                                                                                             
Prithivi Sukt Ki Bhumika